Sonbhadra News: भूजल दोहन से पर्यावरण पर संकट! खदान से रोजाना लाखों लीटर पानी की निकासी, हैवी ब्लास्टिंग से भी ग्रामीणों में बढ़ी चिंता.
सोनभद्र के बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में संचालित श्रीराम एसोसिएट पर खदान में जमा पानी को मशीनों और पाइपों के माध्यम से निकालकर नाले में बहाने का आरोप लगाया गया है। ग्रामीणों का दावा है कि इससे भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और गर्मी में हैंडपंप, कुएं व बोरिंग प्रभावित हो रहे हैं। साथ ही अत्यधिक ब्लास्टिंग से घरों में दरारें आने और खदानों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी की शिकायतें भी सामने आई हैं।
sonbhadra
12:38 PM, Jun 15, 2026
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श्रीराम एसोसिएट की खदान में जमा पानी और जारी खनन गतिविधियां, भूजल दोहन व पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर ग्रामीणों ने उठाए सवाल।
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Story By: आर.एन. पाण्डेय, ओबरा तहसील।
सोनभद्र।
एक तरफ प्रदेश सरकार भीषण गर्मी को देखते हुए जल संरक्षण और भूजल बचाने के लिए लगातार अभियान चला रही है, वहीं दूसरी तरफ बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र स्थित श्री राम एसोसिएट पर बड़े पैमाने पर भूजल दोहन के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि खदान में जमा पानी को मशीनों और पाइपों के जरिए रोजाना लाखों लीटर की मात्रा में बाहर निकालकर सीधे नाले में जा रहा वो नाला अटल भूजल योजना या किसी अन्य जल संचयन से तो कटई नहीं जुड़ा है। इस वजह से लाखों लीटर पानी आसपास के क्षेत्र का बर्बाद हो जा रहा, जिससे आसपास के क्षेत्रों में भूजल स्तर प्रभावित होने लगी है। जानकारों के अनुसार खदान में जलभराव होने पर बड़े स्तर की ब्लास्टिंग, पोकलेन मशीनों के संचालन और खनन कार्य में तकनीकी दिक्कतें आती हैं। यही कारण है कि खदान संचालक उत्पादन और मुनाफे को बनाए रखने के लिए लगातार पानी की निकासी कर रहे हैं। हालांकि पर्यावरणविदों का कहना है कि करोड़ों के मुनाफे के लिए मानव जीवन, वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों को खतरे में नहीं डाला जा सकता।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि प्रचंड गर्मी के कारण क्षेत्र के कई हैंडपंप, कुएं और बोरिंग प्रभावित हो चुके हैं। कई लोगों को पानी की तलाश में रिबोरिंग तक करानी पड़ी है जिससे 125/130 रूपये फिट के हिसाब से 25/30 हज़ार तक का अतरिक्त खर्चा वहन करने को मजबूर हो जाते है, लेकिन गर्मी के मौसम में जल संकट की समस्या बरकरार है। ऐसे में खदानों से लगातार पानी निकाले जाने से ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है। पूर्वांचल भास्कर के संवाददाता ने खुद गहन स्थलीय निरिक्षण कर विशेषज्ञों से राय ली तो उनका भी मानना है कि खदानों में जमा पानी स्थानीय जल संतुलन का हिस्सा होता है। यदि बड़े पैमाने पर इसकी निकासी की जाती है तो भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिससे भविष्य में क्षेत्र पेयजल संकट और गंभीर रूप ले सकता है। नियमों के अनुसार खनन क्षेत्रों में जल प्रबंधन और भूजल संरक्षण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि न तो पर्याप्त वृक्षारोपण किया जा रहा है और न ही जल संरक्षण के लिए कोई ठोस पहल दिखाई दे रही है।
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सूत्रों के अनुसार संबंधित खदान में कई अन्य अनियमितताओं के भी आरोप हैं। दावा किया जा रहा है कि खनन परमिटों का दुरुपयोग किया जा रहा है तथा निर्धारित मानकों से अधिक ब्लास्टिंग की जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अत्यधिक ब्लास्टिंग और जल स्रोतों के क्षरण से चट्टानों के दरकने का खतरा भी बढ़ गया है। खदान में हो रही ब्लास्टिंग से आसपास के आवासीय क्षेत्रों में स्थित घरों की दीवारों में दरारें आ गई हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि श्रीराम एसोसिएट द्वारा की जा रही खनन गतिविधियों के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई है। विश्वासनीय सूत्रों के अनुसार, हज़ारों होल उड़ाए जाते हैं, जिसे 'छोटी ब्लास्टिंग' बताया जाता है। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में होने वाली ब्लास्टिंग से घरों को नुकसान पहुंचना स्वाभाविक है। खनन क्षेत्र में पत्थरों की ढुलाई में भी मनमानी की जा रही है। गाड़ियां अपनी क्षमता से अधिक पत्थर लेकर 300 फीट गहरी खदान से ऊपर चढ़ती हैं। खदानों का रास्ता इतना संकरा है कि यह केवल टायर की चौड़ाई के बराबर बचा है, जबकि बाकी रास्ते पर खनन हो चुका है। खदान की गहराई 200 से 300 फीट तक पहुंच गई है। इन खतरनाक परिस्थितियों के कारण किसी बड़े हादसे की आशंका बनी हुई है।
यदि 300 फीट गहरी खदान से 4.25 घन मीटर पत्थर लेकर ऊपर आती कोई गाड़ी अनियंत्रित होकर पीछे जाती है, तो चालक की जान को गंभीर खतरा हो सकता है। खदानों में काम करने वाले मजदूरों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। पट्टा धारक केवल 10 मजदूरों का ग्रुप बीमा बताते हैं, जबकि खदानों में मजदूरों की संख्या कहीं अधिक है। यह जांच का विषय है कि क्या सभी मजदूरों का बीमा कराया गया है। खनन में लगे वाहन चालकों के बीमा की स्थिति पर तत्काल कार्यवाही और गहन जांच की मांग की गई है। गौरतलब है कि बिल्ली मारकुण्डी खनन क्षेत्र में पूर्व में ब्लास्टिंग के लिए ड्रिलिंग के दौरान खदान का एक बड़ा हिस्सा मजदूरों पर गिर गया था, जिसमें कई श्रमिकों की मौत हो गई थी। घटना के बाद खतरनाक खदानों में सुधारात्मक कार्य कराए जाने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि विभागीय मिलीभगत से नियमों का पालन सिर्फ कागचों तक सिमित रह गया है। क्षेत्रीय नागरिकों ने खदान से हो रही पानी की निकासी, पर्यावरणीय प्रभावों और सुरक्षा मानकों की उच्चस्तरीय जांच कराए जाने की मांग की है। उनका यह भी कहना है कि यदि समय रहते खनन नियमों के विपरीत खदान पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई तो भविष्य में जल संकट के साथ-साथ किसी बड़े हादसे की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।



