Sonbhadra News: बिल्ली मारकुण्डी खनन विवाद: खान विभाग की आख्या से उठे नए सवाल, क्या केवल 'सीमा के भीतर खनन' कहना पर्याप्त?
बिल्ली मारकुण्डी स्थित मेसर्स श्रीराम एसोसिएट्स के खनन पट्टे को लेकर समाजसेवी निर्भय चौधरी की शिकायत पर खान विभाग ने आख्या प्रस्तुत कर खनन को निर्धारित सीमा के भीतर बताया है। वहीं शिकायतकर्ता का कहना है कि मौके पर सीमांकन पिलर स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं हैं, ऐसे में खनन सीमा के भीतर होने का दावा सवालों के घेरे में है।
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4:31 PM, Jul 19, 2026
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बिल्ली मारकुण्डी खनन क्षेत्र की तस्वीरें और शिकायत पत्र, जिनके आधार पर खनन में कथित अनियमितताओं को लेकर जांच की मांग की गई है।
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Story By: आर. एन. पाण्डेय, ओबरा तहसील।
सोनभद्र।
ग्राम बिल्ली मारकुण्डी स्थित मेसर्स श्रीराम एसोसिएट्स के खनन पट्टे में कथित अनियमितताओं को लेकर समाजसेवी निर्भय चौधरी द्वारा की गई शिकायत पर खान विभाग ने अपनी आख्या प्रस्तुत कर दी है। विभाग ने स्थलीय निरीक्षण के दौरान खनन कार्य को पट्टा क्षेत्र की निर्धारित सीमा के भीतर संचालित बताया है, जबकि शिकायत में लगाए गए अन्य आरोपों को संबंधित विभागों के अधिकार क्षेत्र का विषय बताया है। हालांकि विभाग की इस आख्या के बाद पूरे मामले में कई नए सवाल खड़े हो गए हैं। समाजसेवी निर्भय चौधरी ने आईजीआरएस पोर्टल पर दर्ज शिकायत और जिलाधिकारी को दिए गए प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया था कि खनन पट्टे में बिना बेंच (Bench) निर्माण के स्वीकृत मात्रा से अधिक खनन किया जा रहा है। शिकायत में बड़े पैमाने पर विस्फोटकों के उपयोग, खान सुरक्षा मानकों के उल्लंघन, श्रमिकों का पंजीकरण न कराने तथा भूगर्भ जल संबंधी आवश्यक अनुमतियों के बिना खनन किए जाने के आरोप भी लगाए गए थे। शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की थी।
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शिकायत के संबंध में प्रस्तुत आख्या में खान विभाग ने बताया कि तहसील ओबरा के ग्राम बिल्ली मारकुण्डी स्थित आराजी संख्या 7536गमि (खण्ड-4), रकबा 4.000 हेक्टेयर पर मेसर्स श्रीराम एसोसिएट्स के पक्ष में गिट्टी/बोल्डर (डोलो स्टोन) का वैध खनन पट्टा स्वीकृत है। विभाग के अनुसार मौके पर निरीक्षण के दौरान खनन कार्य स्वीकृत सीमा के भीतर संचालित पाया गया। वहीं ब्लास्टिंग एवं विस्फोटकों के उपयोग से जुड़े मामलों को खान सुरक्षा निदेशालय, मजदूरों के पंजीकरण को श्रम विभाग तथा भूगर्भ जल संबंधी अनुमति को भूगर्भ जल विभाग के अधिकार क्षेत्र का विषय बताया गया है। यहीं से इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। किसी भी खनन पट्टे का संचालन केवल पट्टा स्वीकृत होने तक सीमित नहीं होता। इसके लिए पर्यावरणीय स्वीकृतियां, विस्फोटकों के उपयोग की अनुमति, श्रम कानूनों का पालन, भूगर्भ जल संबंधी नियमों का अनुपालन तथा खान सुरक्षा मानकों का पालन भी अनिवार्य होता है। ऐसे में यदि शिकायत इन्हीं बिंदुओं पर है तो यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि जांच में इन सभी पहलुओं पर स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब सामने आए। एक और महत्वपूर्ण सवाल खनन क्षेत्र के सीमांकन (Boundary Demarcation) को लेकर भी उठ रहा है। सामान्यतः प्रत्येक वैध खनन पट्टे की सीमा निर्धारित करने के लिए मौके पर सीमांकन पिलर (Boundary Pillars) लगाए जाते हैं, जिन्हें पीले और लाल रंग से रंगकर स्पष्ट रूप से चिन्हित किया जाता है।
यही पिलर यह सुनिश्चित करते हैं कि खनन स्वीकृत क्षेत्र से बाहर न हो। यदि मौके पर ऐसे सीमांकन पिलर स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते या उनका भौतिक सत्यापन नहीं किया गया है, तो केवल यह कह देना कि खनन "निर्धारित सीमा के भीतर" पाया गया, अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। आखिर बिना स्पष्ट सीमांकन के निरीक्षण के दौरान सीमा का निर्धारण किस आधार पर किया गया? विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में ड्रोन सर्वे, डीजीपीएस (DGPS) सर्वे, राजस्व अभिलेखों और भौतिक सीमांकन पिलरों का संयुक्त सत्यापन ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकता है। यदि सीमांकन पिलर मौके पर मौजूद नहीं हैं या क्षतिग्रस्त हैं, तो पहले उनका पुनः सीमांकन कराया जाना भी आवश्यक है। फिलहाल शिकायतकर्ता के आरोप और खान विभाग की आख्या में अलग-अलग तथ्य सामने आए हैं। ऐसे में पारदर्शिता और जनविश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि खान विभाग, खान सुरक्षा निदेशालय, भूगर्भ जल विभाग, श्रम विभाग तथा पर्यावरण से जुड़े अधिकारियों की संयुक्त जांच कराई जाए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। यदि शिकायत निराधार है तो तथ्यों के साथ उसका खंडन होना चाहिए, और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। यही इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण और जनहित से जुड़ा पहलू है।



