Sonbhadra News: डाला मलिन बस्ती भूमि विवाद: डीएम-एसपी के सामने फूटा रहवासियों का दर्द, बेदखली का जताया डर.
डाला नगर पंचायत के वार्ड-2 एवं 3 स्थित मलिन बस्ती में भूमि विवाद को लेकर जिलाधिकारी चर्चित गौड़ और पुलिस अधीक्षक अभिषेक वर्मा ने स्थलीय निरीक्षण किया। इस दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने वर्षों से भूमि पर निवास का दावा करते हुए संभावित बेदखली का विरोध किया। रहवासियों का कहना है कि मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है और अंतिम निर्णय तक उन्हें नहीं हटाया जाना चाहिए।
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8:51 PM, Jul 11, 2026
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डाला मलिन बस्ती में भूमि विवाद का स्थलीय निरीक्षण करते जिलाधिकारी चर्चित गौड़ और पुलिस अधीक्षक अभिषेक वर्मा।
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Story By: आर. एन. पाण्डेय, डाला।
सोनभद्र।
नगर पंचायत डाला के वार्ड संख्या-2 एवं 3 स्थित मलिन बस्ती में शनिवार को जिलाधिकारी चर्चित गौड़ और पुलिस अधीक्षक अभिषेक वर्मा ने भूमि विवाद के संबंध में स्थलीय निरीक्षण किया। अधिकारियों के आने की सूचना मिलते ही सैकड़ों की संख्या में स्थानीय रहवासी हनुमान मंदिर परिसर में एकत्र हो गए और अपनी समस्याओं को प्रशासन के सामने रखा। निरीक्षण के दौरान बस्ती के लोगों ने बताया कि उनका परिवार कई पुस्तो से इस भूमि पर निवास कर रहा हैं। उनका कहना था कि जब तक सीमेंट कंपनी सरकार के अधीन संचालित थी, तब तक किसी प्रकार की परेशानी नहीं हुई। लेकिन कंपनी के निजी हाथों में जाने के बाद समय-समय पर उन्हें भूमि खाली करने का दबाव बनाया जाने लगा।
रहवासियों का आरोप है कि पहले जेपी एसोसिएट्स इस जमीन को अपनी बताकर कब्जा करने का प्रयास कर रही थी, अब आदित्य बिरला समूह की अल्ट्राटेक सीमेंट कंपनी भी इस भूमि पर अपना दावा कर रहा है। इससे बस्ती के लोगों में भविष्य को लेकर चिंता और असमंजस की स्थिति बनी हुई है। उन्होंने अधिकारियों से मांग की कि जब तक न्यायालय का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक उन्हें किसी भी प्रकार से बेदखल न किया जाए। स्थानीय लोगों ने बताया कि भूमि विवाद का मामला वर्तमान में हाई कोर्ट में विचाराधीन है और अभी तक किसी भी पक्ष के हक में अंतिम निर्णय नहीं आया है।
इसके बावजूद कंपनी की ओर से दबाव बनाए जाने की शिकायत उन्होंने जिला प्रशासन से की। जिलाधिकारी चर्चित गौड़ और पुलिस अधीक्षक अभिषेक वर्मा ने पूरे क्षेत्र का निरीक्षण किया और रहवासियों की समस्याओं को गंभीरता से सुना। अधिकारियों ने मौके की वास्तविक स्थिति का जायजा लिया। हालांकि निरीक्षण के दौरान उन्होंने कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की और निरीक्षण पूरा करने के बाद वापस लौट गए। रहवासियों को उम्मीद है कि जिला प्रशासन उनकी समस्याओं को शासन स्तर तक पहुंचाएगा और न्यायालय के अंतिम निर्णय तक उनके हितों की रक्षा सुनिश्चित करेगा। स्थानीय लोगों ने बताया जिस जगह पर भूमि का विवाद है वहां नगर पंचायत द्वारा करोड़ों का विकास किया जा चुका है और ऐसे में अगर कंपनी जमीन कब्जा ले लेती है तो डाला नगर पंचायत के अस्तित्व पर ही खतरा हो सकता है क्योंकि आबादी और वार्ड के हिसाब से कमी होने पर नगर पंचायत खत्म हो सकता है।
डाला नगर पंचायत की मलिन बस्ती के भूमि विवाद को लेकर स्थानीय प्रतिनिधि उमेश प्रसाद मेहता ने कहा कि यह संघर्ष केवल जमीन का नहीं बल्कि स्थायी निवास और लोगों के अधिकारों का है। उन्होंने बताया कि संबंधित भूमि पहले खाता संख्या-113 में दर्ज थी और इस पर वर्षों तक वन विभाग तथा तत्कालीन सरकारी सीमेंट फैक्ट्री के बीच विवाद चलता रहा। उनके अनुसार वर्ष 1994 में वन विभाग यह मुकदमा हार गया था। उन्होंने दावा किया कि वनवासी सेवा आश्रम एवं मोरे सनम वेलफेयर सोसाइटी से जुड़े आदेशों में वर्षों से निवास कर रहे लोगों को भूमि का अधिकार देने की बात कही गई थी, लेकिन इसके बजाय भूमि सीमेंट कॉरपोरेशन को दे दी गई।
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बाद में जेपी एसोसिएट्स और वर्तमान में अल्ट्राटेक कंपनी ने भी इस भूमि पर अपना दावा किया। उन्होंने बताया कि कंपनी के नाम दाखिल-खारिज के खिलाफ उन्होंने न्यायालय में रेस्टोरेशन याचिका दाखिल की थी और बाद में अल्ट्राटेक के पक्ष में हुए हस्तांतरण के खिलाफ भी कानूनी चुनौती दी गई। उनका कहना है कि मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी के पास पहले से पर्याप्त भूमि उपलब्ध है, इसलिए मलिन बस्ती के लोगों को हटाने का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि हाईकोर्ट से न्याय नहीं मिला तो वे सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ लोगों ने मुआवजा लिया है, हालांकि कई परिवार अपने भूमि अधिकार की कानूनी लड़ाई जारी रखे हुए हैं।
मामले को लेकर भाजपा के जिला उपाध्यक्ष धीरेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि डाला नगर पंचायत के वार्ड-2 और 3 में वर्षों से रह रहे परिवारों के सामने भूमि विवाद की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है। उन्होंने बताया कि गाटा संख्या 179 एवं 189 (राजस्व अभिलेखों के अनुसार सत्यापन अपेक्षित) की भूमि पर लंबे समय से लोग निवास कर रहे हैं। उनके अनुसार निजी कंपनी के प्रतिनिधियों ने न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए लोगों को अन्यत्र स्थानांतरित करने की बात कही है।
उन्होंने कहा कि जिलाधिकारी से हुई बातचीत में यह बात सामने आई कि बस्तीवासियों का पक्ष और मजबूत किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि प्रशासन लोगों के हित में निर्णय लेता है तो उसका स्वागत किया जाएगा, लेकिन बिना उचित पुनर्वास के किसी भी परिवार को हटाना स्वीकार नहीं होगा। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोग लगभग 50 वर्षों से यहां रह रहे हैं और उनके घर, परिवार तथा बच्चों का भविष्य इसी स्थान से जुड़ा है। क्षेत्र की समिति और स्थानीय नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के आदेशों का सम्मान करते हुए भी बस्तीवासियों के संवैधानिक एवं मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक होने पर हाईकोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी।
मलिन बस्ती के निवासी घनश्याम प्रसाद कुशवाहा ने बताया कि यह विवाद लगभग 338 प्रभावित परिवारों से जुड़ा हुआ है और वर्तमान में मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। उन्होंने कहा कि इस प्रकरण में एडीएम और एसडीएम सहित प्रशासनिक अधिकारी भी पक्षकार हैं। उनके अनुसार वर्ष 2012 में कुछ प्रभावित लोगों को एक लाख रुपये तथा एक बिस्सा भूमि मुआवजे के रूप में दी गई थी, लेकिन इसके बावजूद विवाद समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि पिछले 12 वर्षों में इस क्षेत्र में करोड़ों रुपये के विकास कार्य कराए गए, लेकिन अब पुराने आदेशों का हवाला देकर लोगों को हटाने का प्रयास किया जा रहा है। उनका कहना है कि बस्तीवासियों को भी सम्मानपूर्वक रहने का अधिकार है और वे इसी अधिकार की लड़ाई न्यायालय में लड़ रहे हैं।
उन्होंने बताया कि कई सामाजिक संगठन और अधिवक्ता भी उनके पक्ष में कानूनी सहायता कर रहे हैं। घनश्याम प्रसाद ने आरोप लगाया कि समय-समय पर सरकार और कंपनी के बीच मिलीभगत की बातें सामने आती रही हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है और यदि आवश्यकता पड़ी तो हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अपने अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगे। साथ ही उन्होंने मांग की कि अंतिम न्यायिक निर्णय तक किसी भी परिवार को बेवजह परेशान या बेदखल न किया जाए। बताया जा रहा है कि निरीक्षण का उद्देश्य मौके की स्थिति का आकलन करना और लोगों की समस्याओं को समझना था, ताकि नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की जा सके।
