Sonbhadra News: बिल्ली मारकुंडी खनन क्षेत्र में भविष्य का संकट: 250 केवीए ट्रांसफार्मर और बड़े जनरेटर से भूजल दोहन के आरोप.
सोनभद्र के बिल्ली मारकुंडी खनन क्षेत्र स्थित मेसर्स मंगला प्रसाद श्री लाल जी खदान को लेकर स्थानीय लोगों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि 250 केवीए ट्रांसफार्मर और बड़े जनरेटर के जरिए बड़े पैमाने पर भूजल दोहन किया जा रहा है। साथ ही मानकों के विपरीत हेवी ब्लास्टिंग और निर्धारित सीमा से अधिक खनन होने का भी आरोप लगाया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि इससे भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है।
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3:30 PM, Jun 26, 2026
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मेसर्स मंगला प्रसाद श्री लाल जी खदान खदान में ट्रांसफार्मर, विद्युत केबल, गहरी खदान और जल निकासी को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप।
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Story By: आर. एन. पाण्डेय, डाला।
सोनभद्र।
बिल्ली मारकुंडी खनन क्षेत्र के बाड़ी डाला स्थित मेसर्स मंगला प्रसाद श्री लाल जी के नाम आवंटित खदान को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। स्थानीय लोगों और पर्यावरण से जुड़े लोगों का दावा है कि खदान में 250 केवीए का ट्रांसफार्मर तथा बड़े जनरेटर के माध्यम से बड़े पैमाने पर भूजल का दोहन किया जा रहा है, जिससे क्षेत्र का जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। बिजली विभाग से जानकरी लेने में जवाब मिलता है की हम आपके लिए जवाबदेही नहीं है, इस सवाल का जवाब हम उच्च अधिकारियों के पूछने पर देंगे। जिस जगह ट्रांसफार्मर रखा हुआ है उसे जगह तारे बिखरी हुई है ऐसे में अगर कोई घटना घटित हो जाती है तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?
बताया जा रहा है कि यह खनन पट्टा 2.10 हेक्टेयर क्षेत्र में सर्वे नंबर 7410, 7409, 7402, 7403, 7404 एवं 7405 पर ई-टेंडर के माध्यम से आवंटित हुआ है। आरोप है कि खदान परिसर में स्थापित ट्रांसफार्मर और जनरेटर का उपयोग पत्थर खनन के साथ-साथ भारी मात्रा में पानी निकालने के लिए किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में पहले जहां 50 से 60 फीट पर पानी उपलब्ध हो जाता था, वहीं अब कई स्थानों पर 300 से 1000 फीट तक बोरिंग करनी पड़ रही है। उनका आरोप है कि इससे आम लोगों के साथ-साथ वन्यजीवों और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। वहीं, ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि निर्धारित मानकों के विपरीत हेवी ब्लास्टिंग की जा रही है।
खदान से 50 से 100 मीटर दूरी पर बसे घरों में कंपन महसूस होता है, कई बार पत्थर गिरने से मकानों को नुकसान पहुंचने और लोगों के घायल होने की बात भी ग्रामीणों ने कही है। उनका कहना है कि ब्लास्टिंग से उड़ने वाली धूल और सिलिका कण स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हैं तथा इससे सिलिकोसिस जैसी बीमारी का जोखिम बढ़ सकता है। स्थानीय लोगों का यह भी दावा है कि संबंधित खदान को एक वर्ष में 60 हजार घन मीटर खनन की पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त है,
जबकि प्रतिदिन स्वीकृत सीमा से कहीं अधिक पत्थर की ढुलाई की जा रही है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि इससे सरकार को बड़े पैमाने पर राजस्व का नुकसान हो रहा है और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जानी चाहिए। अगर कार्यवाही सही से निष्पक्ष होती है तो सरकार को बड़े पैमाने पर अतरिक्त राशि की प्राप्ति होगी जो विकास कार्यों में काम आएगी।
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ग्रामीणों ने खदान में कार्यरत ड्रिलिंग एवं कंप्रेसर मशीन संचालकों की सुरक्षा, जीवन बीमा और श्रम मानकों की भी जांच कराने की मांग की है। 420 रुपये की डीहाढी पर मज़दूरी करने वाले की सुरक्षा गारंटी चाहिए। उनका कहना है कि अत्यधिक जोखिम वाले कार्य करने वाले श्रमिकों के सुरक्षा प्रबंधों की भी समीक्षा होनी चाहिए।
सवाल यह है कि आखिर प्राकृतिक संसाधनों के इस अंधाधुंध दोहन की कीमत कौन चुकाएगा- सरकार, खनन कंपनी या फिर आने वाली पीढ़ियां? ग्रामीणों का कहना है कि जिस इलाके में कभी 50 से 60 फीट पर पानी मिल जाता था, वहां आज 300 से 1000 फीट तक बोरिंग करनी पड़ रही है। यदि यह स्थिति लगातार बिगड़ रही है तो यह केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य का संकट है। विकास के नाम पर यदि पानी ही खत्म हो जाए, तो फिर उस विकास का क्या अर्थ रह जाएगा? इतना ही नहीं, स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्धारित मानकों के विपरीत भारी ब्लास्टिंग की जा रही है।
कंपन से मकानों में दरारें पड़ने, पत्थर गिरने और धूल के गुबार से लोगों का जीवन प्रभावित होने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। यदि खदानों के आसपास रहने वाले लोग अपने ही घरों में सुरक्षित नहीं हैं, तो प्रशासनिक निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। चर्चा इस बात की भी है कि पर्यावरणीय स्वीकृति सीमित मात्रा में खनन की है, लेकिन प्रतिदिन उससे कई गुना अधिक पत्थर की ढुलाई होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। यदि ऐसा हो रहा है तो राजस्व विभाग, खनन विभाग और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े जिम्मेदार तंत्र की भूमिका पर भी सवाल उठेंगे।
क्या नियमित निरीक्षण हो रहे हैं? यदि हो रहे हैं तो अनियमितताएं क्यों नहीं रुक रहीं? और यदि नहीं हो रहे हैं, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? एक और महत्वपूर्ण पहलू मजदूरों का है। ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग जैसे अत्यंत जोखिमपूर्ण कार्य करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और जीवन बीमा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। क्या इन श्रमिकों को सभी कानूनी सुविधाएं मिल रही हैं या फिर वे केवल जोखिम उठाने तक सीमित हैं?
प्राकृतिक संसाधन किसी एक व्यक्ति या संस्था की निजी संपत्ति नहीं होते। उनका उपयोग विकास के लिए हो सकता है, लेकिन दोहन इस सीमा तक नहीं होना चाहिए कि भविष्य ही संकट में पड़ जाए। यदि स्थानीय लोगों की शिकायतें निराधार हैं तो प्रशासन को पारदर्शी जांच कर सच्चाई सामने लानी चाहिए। और यदि आरोपों में दम है तो नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। बिल्ली मारकुंडी का मामला अब केवल एक खदान तक सीमित नहीं रह गया है। यह पर्यावरण संरक्षण, राजस्व, श्रमिक सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा विषय बन चुका है। जनता को आरोपों का नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और स्पष्ट जवाब का इंतजार है।



