मुख्य खबरें/न्यूज़/sonbhadra news lakhs of rupees were gamed in tree plantation on the banks of renuka river standards were openly ignored

Sonbhadra News : रेणुका नदी किनारे वृक्षारोपण में लाखों का ‘खेला’, मानकों की खुली अनदेखी.

ओबरा के पारसोई-4 स्थल पर कागजों में 6112 गड्ढे दिखाए गए, जबकि मौके पर अधिकतर खाली मिले। जहां पौधे लगाए गए, वहां 5 मीटर की जगह 1 मीटर में ही 25-30 पौधे ठूंस दिए गए। 15.28 हेक्टेयर क्षेत्र में काम दिखाने के लिए एक ही जगह रोपण कर लक्ष्य पूरा करने का आरोप है। 1600 मीटर सुरक्षा खाई का दावा भी जमीन पर नहीं दिखा, जिससे पौधे असुरक्षित हैं। सिंचाई और देखभाल के अभाव में पौधों के सूखने का खतरा बढ़ गया है।

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3:51 PM, Apr 28, 2026

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Sonbhadra News : रेणुका नदी किनारे वृक्षारोपण में लाखों का ‘खेला’, मानकों की खुली अनदेखी.
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15.28 हेक्टेयर क्षेत्र में काम दिखाने के लिए एक ही जगह रोपण कर लक्ष्य पूरा करने का आरोप है।

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Story By: विकास कुमार हलचल, ब्यूरों सोनभद्र।

ओबरा क्षेत्र में रेणुका नदी के तट पर किए गए वृक्षारोपण कार्य में गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। यह मामला ऐसे समय में आया है जब सरकार प्रदेश को हरा-भरा बनाने के लिए बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान चला रही है। स्थानीय वन विभाग की कथित लापरवाही और भ्रष्टाचार ने इस अभियान की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला पारसोई-4 वृक्षारोपण स्थल का है। यहां लगाए गए बोर्ड पर 6112 'बोना नाली' (गड्ढे) बनाए जाने का दावा किया गया है। हालांकि, मौके पर निरीक्षण के दौरान अधिकांश गड्ढे खाली पाए गए। जहां कुछ पौधरोपण किया भी गया है, वहां भी विभागीय मानकों की खुलेआम अनदेखी की गई है। नियमानुसार, पौधों के स्वस्थ विकास के लिए उनके बीच लगभग 5 मीटर की दूरी होनी चाहिए। लेकिन, इस स्थल पर एक मीटर के दायरे में ही 25 से 30 पौधों को एक साथ लगा दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार का रोपण पौधों की देखभाल नहीं, बल्कि उनके जीवित रहने की संभावना को कम करता है।स्थानीय ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि पूरे 15.28 हेक्टेयर क्षेत्र में कार्य दिखाने के लिए विभाग ने वास्तविक श्रम से बचने का प्रयास किया। उन्होंने एक ही स्थान पर पौधों को ठूंसकर लक्ष्य पूरा दिखाया। ग्रामीणों के अनुसार, मजदूरी और संसाधनों की बचत के लिए यह 'खानापूर्ति' की गई है, जिससे सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका बढ़ गई है। इसके अतिरिक्त, नदी के किनारे मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए प्रस्तावित 1600 मीटर सुरक्षा खाई (सीपीटी) भी मौके पर मौजूद नहीं है। सुरक्षा के अभाव में आवारा पशु पौधों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। स्थल पर सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं दिखी, न ही पौधों के संरक्षण के लिए खाद या कीटनाशकों का उपयोग किया गया है।यह पूरा मामला वन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि समय रहते इस मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई, तो सरकार की हरित योजना केवल कागजों तक ही सीमित होकर रह जाएगी।


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