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Sonbhadra News: सपा विधायक विजय सिंह गोंड़ का निधन, राजनीती में आदिवासियों के पितामह के रूप में थी पहचान.

दुद्धी क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के विधायक विजय सिंह गोंड़ का लखनऊ के पीजीआई में इलाज के दौरान निधन हो गया। वे लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे और उनकी दोनों किडनियां खराब हो गई थीं। हालत बिगड़ने के बाद उन्हें एसजीपीजीआई में भर्ती कराया गया था। जहां इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की पुष्टि विधानसभा अध्यक्ष अवधनारायण यादव ने की है।

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5:44 PM, Jan 8, 2026

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Sonbhadra News: सपा विधायक विजय सिंह गोंड़ का निधन, राजनीती में आदिवासियों के पितामह के रूप में थी पहचान.
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अखिलेश यादव ने विजय सिंह गोंड़ की मृत्यु पर दुःख प्रकट करते हुए शोक संतप्त परिजनों के प्रति गहरी संवेदनाएं प्रकट की,

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Story By: विकास कुमार हलचल, ब्यूरों सोनभद्र।

सोनभद्र।

दुद्धी क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के विधायक विजय सिंह गोंड़ का लखनऊ के पीजीआई में इलाज के दौरान निधन हो गया। वे लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे और उनकी दोनों किडनियां खराब हो गई थीं। हालत बिगड़ने के बाद उन्हें एसजीपीजीआई में भर्ती कराया गया था। जहां इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की पुष्टि विधानसभा अध्यक्ष अवधनारायण यादव ने की है।

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विजय सिंह गोंड़ आदिवासी समाज के बीच एक प्रमुखनेता के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे आदिवासियों के मुद्दों पर सक्रिय रहते थे और उनके उत्थान के लिए कार्य करते थे। उनके निधन की खबर से परिजनों और सोनभद्र समेत पूर्वांचल के अन्य जिलों में शोक की लहर दौड़ गई। क्षेत्र के आदिवासी समुदाय और उनके समर्थकों ने विधायक के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है।

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उनके समर्थकों का कहना है कि वह जनता से गहरा लगाव रखते थे। इससे बड़ा उदाहरण कोई नहीं होगा, दूसरा कोई विजय सिंह गौड़ नहीं पैदा होगा। बता दे कि दुद्धी विधानसभा के (एसटी सुरक्षित) उपचुनाव में 2024 में जीत कर फिर से विधायक बने थे, विजय सिंह गोंड़ दुद्धी विधानसभा क्षेत्र से कुल आठ बार विधायक रहे थे।

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जिला पंचायत सदस्य बगाड़ू और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सपा दुद्धी जुबेर आलम ने उनके निधन पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि विजय सिंह गोंड़ ने क्षेत्र के गरीब और मजलूमों के लिए काम किया। वह गलत को गलत कहने की हिम्मत रखते थे। उनको याद करते हुए जुबेर आलम ने बताया, विजय सिंह गोंड़ जब पहली बार चुनाव लड़ा था। उस समय दुद्धी क्षेत्र में सड़कों और पुलों की स्थिति खराब थी। उन्होंने पैदल चलकर चुनाव प्रचार किया और जनता के बीच अपनी पहचान बनाई।

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फ़ाइल फ़ोटो।

विधायक गोंड़ गरीबों और आदिवासियों के हितों के लिए मुखर रहे। वह प्रतिदिन जनसुनवाई करते थे और लोगों को न्याय दिलाने के लिए थाना, कचहरी, ब्लॉक, तहसील, एसडीएम और डीएम कार्यालयों तक साथ जाते थे। पड़ोसी राज्यों झारखंड और छत्तीसगढ़ में नक्सली गतिविधियां चरम पर थीं, लेकिन दुद्धी के सीमावर्ती गांवों में नक्सलवाद नहीं पनप पाया। इसका श्रेय विजय सिंह गोंड़ को दिया जाता है। स्थानीय लोगों का मानना था कि विधायक उनकी समस्याओं को सुनते हैं, जिससे नक्सलियों को यहां कोई समर्थन नहीं मिला।

विजय सिंह गोंड़ ने दुद्धी क्षेत्र में जिला मुख्यालय बनाने की मांग को लेकर उनका मतभेद अपने गुरु स्वर्गीय रामप्यारे पनिका से भी हो गया था। मुलायम सिंह यादव ने पिपरी में इसका शिलान्यास भी किया था, लेकिन बाद में मायावती सरकार ने इसे रॉबर्ट्सगंज स्थानांतरित कर दिया। मुख्यालय की मांग के मुद्दे पर कांग्रेस से उनका टिकट कट गया था, लेकिन जनता के समर्थन से उन्होंने तीर-धनुष चुनाव चिन्ह पर निर्दलीय चुनाव लड़ा और विधायक बने।

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फ़ाइल फ़ोटो।

वह जिला मुख्यालय की मांग पर हमेशा अडिग रहे। विधायक स्वर्गीय विजय सिंह गोंड़ ने अपने कार्यकाल में क्षेत्र में अनेक सड़कें, पुल, स्कूल और अस्पताल बनवाए। उन्होंने सर्वे सेटलमेंट के दौरान गरीबों और आदिवासियों के हक में आवाज उठाई, जिसके चलते उन पर रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) लगाया गया। इस मामले में उन्हें एक साल तक जेल में रहना पड़ा था।

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फ़ाइल फ़ोटो।

उनके समर्थकों का कहना है कि वह जनता से गहरा लगाव रखते थे। इससे बड़ा उदाहरण कोई नहीं होगा, दूसरा कोई विजय सिंह गौड़ नहीं पैदा होगा। विजय सिंह गोंड़ को पूर्वांचल और सोनभद्र क्षेत्र में आदिवासी राजनीति का एक मजबूत स्तंभ माना जाता थ

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दुद्धी विधानसभा सीट पर उन्हें आदिवासी राजनीति का 'पितामह' कहा जाता था। आदिवासी समाज ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिसने दशकों तक उनकी आवाज को मजबूती से उठाया। विजय सिंह गोंड़ का राजनीतिक सफर बेहद साधारण पृष्ठभूमि से शुरू हुआ था।

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वे वनवासी सेवा आश्रम में मात्र 200 रुपये मासिक मानदेय पर कार्य करते थे। वर्ष 1979 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर पहली बार विधानसभा चुनाव जीतकर राजनीति में कदम रखा और उसके बाद लगातार जनता के बीच सक्रिय रहे।

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आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए उनके समर्पण का प्रमाण दुद्धी और ओबरा विधानसभा क्षेत्रों को अनुसूचित जनजाति सीट घोषित कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक उनकी कानूनी लड़ाई थी। वे हमेशा आदिवासी हितों को लेकर मुखर रहे और किसी भी मंच पर उन्होंने समझौता नहीं किया।


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